बिहार के बारे में बहुत कुछ लिखा जाता रहा हैं. कुछ सही कुछ मंगरंथ . आज का बिहार बहुत बदला हुआ है. कुछ लोग इसे मिथला से जोड़ कर देखते है तो कुछ लोग भोजपुर से , पर सोचनेवाली बात यह है कि क्या बिहार कि संस्कृति सिर्फ इन्ही दो भाषाओ कि संस्कृतियो से जुडी है? मगध भी बिहार का अभिन्य अंग रहा है.मगध के इतिहास के बारे में सब लोग जानते भी है और बात भी होती है. अब तो नालंदा में विश्व स्तर का एक ज्ञान का एक केंद्र भी बनाया जा रहा है. इसके लिए चाहे प्रणव मुखर्जी का प्रयास रहा हो या नितीश कुमार का है तो यह महत्वपूर्ण . अगर बुध्ह के समए को ही शुरुआत मान ले बिहार की संस्कृति का तो भी सोचा जाना चाहिए की जिस परिवेश और जगह ने राहुल को गौतम बुध बना दिया, उस जगह की हालत एसी किउ हो गई या फिर प्रतेक कुछ सालो के बाद एसी हालत किउ हो जाती है ?
में तो जाएदा पढालिखा आदमी नहीं हु पर अपने घर के बारे में तो हरकोई सोचता है उसी तरह में भी सोचता हु. क्या है हमारी संस्कृति?कौन है हमलोग? सोचता हु और परेशां हो जाता हु. सोचा किउ नहीं अपने जैसे और लोगो को परेशां करू.और आज मेरा ब्लॉग पर जनम हो गया.
में अपनी संस्कृति की शुरुआत चलिए सूर्य की पूजा से करता हु यानि उस पूजा से जो सब से जाएदा लोकप्रीया है और सब वाकिफ है. क्या होता है उसमे? सब से पहले डूबते सूर्य को अर्ध्य देते है. है न? यानि जानेवाले को नमन यानि बुजुर्गो का सम्मान. अगर इतनी भी समझ में आ जाए तो राज्य का और देश का भला हो जाए. पर लगता नहीं है की शिकारी आएगा दाना डालेगा लोभ में फसाना नहीं रटने हुए जाल में फस जाते है? सोचिए और मेरी मदद कीजिए समझाने में अपनी संस्कृति को
धन्वाद.
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