अशोक का राजा बनना भी हमारी संस्कृति का अहम् हिस्सा है. इतिहासकार बताते है की उसके काल में मौत की सजा नहीं दी जाती थी और पशुबलि पर मनाही थी. हिंसा कभी भी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रही और यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है. गाँधी ने इस बात को समझा और हमारा स्वतंत्रता आन्दोलन भी इसका एक प्रमाण है. हमारी संस्कृति का ५००० साल से लगातार जीवित रहना इसी ताकत की देन है. सरलता, सादगी और सच्चाई हमारी पहचान है. बुद्ध को इसी बात का ज्ञान गया में हुआ. सुजाता का खीर इसी का प्रतिबिम्ब है. समय के साथ सब कुछ बदल जाता है नहीं बदलता तो सिर्फ यह मूल्य. बिहारी होने के नाते हमारा क्या कर्तव्य नहीं हो जाता कि इस धरोहर को बचा कर रखे?
राजे राज्वारे ख़तम हो जाते है सुख के साथ साथ दुःख भी ख़तम हो जाते है, पर समाज को तो जीवित रहना है . मेरी पीढ़ी ने सिर्फ टूटना ही देखा है जुडा है तो सिर्फ जर्मनी. हम भी टूट रहे है झारखण्ड आज हमसे अलग है बोलते है विकास के लिए ज़रूरी है टूटन हो भी सकता है. पर एसा दिखता तो नहीं. जिसे दिखता है उनके आँखों पर शायद कुछ अच्छा ही चश्मा लगा होगा. सांस्कृतिक तौर पर आदिवाशी हमारे समाज के महत्वपूर्ण हिस्सा रहे है. उनका चुल्लाह अलग कर देने से ही समस्या हल हो जाएगी क्या?
लोकतान्त्रिक चुनाव आ रहा है बिहार में. नगाड़े कि आवाज़ सुनाई पर रही है. सारी पार्टियो का अपना अपना शिव है और उनकी मंडली .सभी शिव के अपनी अपनी मंडली है. महाशिव बनने के लिए युद्ध होनेवाला है. इस शिव के तांडव पर विचार करने की ज़रूरत है. किस तरह करे विचार? सभी शिव की विवेचना कर के? लोगो को आधार मान कर? विकास को मुद्दा मान कर? जातियो का समर्थन से? किस तरह?
चलिए, शुरुआत करते है जातियो से, येही सब से बड़ा आधार रहा है पत्रकारों के लिए
जाति हमेशा थी और रहेगी. हर पार्टी में हर जात के लोग है. करीब करीब हर जात के लोग मुख्या मंत्री भी रह चुके है , पर भला तो किसी जात का नहीं हुआ . भला जात का होता भी नहीं और कोई भी नेता जात जात बोलता भी नहीं
यह हमारे पत्रकार बंधू लगे रहते है चूरन बनाने में. माना की चूरन अच्छा और जल्दी बिकता है खाने में भी अच्छा लगता है पर मत भूलिए चूरन जेदा दिन नहीं चलेगा. जनता को समझिए नहीं तो दिन दूर नहीं जब पत्रकारों की इज्ज़त भी................... हाँ
एक थे प्रभाष जोशी .नेक इंसान.अछे पत्रकार. उच्चे विचारक. नहीं रहे, पर उन्होंने जो पत्रकारों को बिकते हुए देखा उससे बहुत ही दुखी हुए और सोचा था की इसके खिलाफ आवाज़ उढाई जाए, पर वो ही नहीं रहे. कोई बात नहीं
इस संग्राम में तीन चार मुख्य शिव है नितीश कुमार,लालू प्रसाद यादव और कोंग्रेस में राम विलास पासवान को नहीं लिखा किउ की वो तो हनुमान बन गए है लालू जी का नितीश जी के पास इन ५ सालो का काम है लालू जी के पास जातियो का जोड़ है और कोंग्रेस के पास माँ है
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