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Friday, August 27, 2010

मन बहुत उदास है. उदासी का सबब तो नहीं पता पर मन करता है सब कुछ उलट पुलट कर दू , पर उस से भी कुछ होगा तो नहीं उदासी को उलट भी दूंगा तो दास ही रहूँगा दासत्व के बोझ से कैसे निकलू दासत्व भी एक ताकत तो नहीं?

 अपने मन के दास बना रहना प्रकृति का  एक निएम है ज्ञानी लोग अपने ज्ञान से इस पर काबू बनाए रखते है और समुद्र की भाति मन में सब रहस्य को समेटे जीवन  की नैया चलाते रहते है, पर में एसा किउ नहीं कर पाता, मुझे ख़ुशी  और दुःख  बहुत जल्दी किउ परेशां करते है?इसका भी कुछ लेना देना है क्या अपनी संस्कृति से ?
बहुतो से बात हुई और सब का कहना है आप हर बातो को दिल से लगा लेते है हमारे गावो में भी मेरे जैसे लोग रहते है वो भी बहुत जल्दी खुश हो जाते है और नाराज़ भी.  इतने सालो में भी मेरा  शहरीकरण नहीं हुआ क्या? अरे अब तो गाव में  भी शहरी हो गए है. नहीं?  यह भी शायद व्यवाहरिक जीवन से हट कर सपनो में जीने का फल है . तो क्या संस्कृति से जुडा रहना ठीक नहीं? या फिर अपनी संस्कृति  का दिखावा करते हुए सभ्यता का मज़ा लूटना ही जीवन है? खैर जो भी हो यह पीर सिर्फ मेरा नहीं हो सकता? येही पीर तो कबीर को भी रही होगी, रहीम को भी रही होगी उन्होंने अपनी रचनाओ में अपने दर्द को रखा. मेरा  दर्द उतना गहरा नहीं है किउकी में मुक्तिबोध का वो क्रन्तिकारी हु जिसकी कांख भी दबी है और मुठी भी तनी है,भले कांख के नीचे कुछ भी नहीं.

राजनेतिक तौर पर आज हर बिहारी उदास है. पर करे  क्या?चुनाव का वक़्त आ गया है बिगुल बजने लगे है. डंके की आवाज़ आने लगी गई है . मेरे एक मित्र  ने बताया की सेना भी सज चुकी है यानि कौन सिपाही कहा से खड़ा  होगा इसका भी निश्चय हो चूका है बस शंखनाद होना बाकी है .

में इस पर टिपण्णी नहीं करना चाहता कि कौन जीत सकता है और कौन हार ,पर एक जागरूक बिहारी होने के नाते यह तो सोच ही सकता हू कौन क्या लगता है .लगता है इसलिए बोल रहा हू क्योकि  रणभूमि में सब नकाब में है. सब के चहरे पर सुनहला और हसता हुआ नकाब है. 
समय बदल गया है. अब पार्टी कि बात बेमानी है अब तो नेताओ  कि बात कि जाए .नितीश कुमार बाढ़ से उपजे सूखे के राजनीतिकर .पढ़े लिखे, हसमुख और अफसरों कि राजनीती करनेवाले व्यक्ति.इनके समय में काम होता हुआ दिखाई देता है .अफसरों कि चलती भी बहुत है.इस वज़ह से अपनी पार्टी में यह अकेले मुख्या पात्र है किउकी इनके आलावा कोई है तो ,तो है अफसर .नरेन्द्र मोदी का बिहारी संस्करण लगते है सिर्फ इनके  पीछे कोई गोधरा कांड नहीं जुडा है. यह हिन्दू मुस्लिम के लड़ाई में नहीं परते यह मुस्लिम को मुस्लिम से लडाते है और हिन्दू को हिन्दू से. जाति के समीकरण में कमज़ोर है पर इन्होने बहुत सी जातिया ही तोड़ डाली है  यह जाति परंपरा को नहीं बल्कि जाति को तोड़ना जानते है या एसा प्रतीत होता है. इस मामले में एह मज़ा ले लो पार्टी है कल जो होगा देख लेंगे. यह भी जय प्रकाश नारायण के जेहाद से निकले नेता है और लालू विरोध लहर से उपजे मुख्या मंत्री या यूकि राज्यपाल बूटा सिंह कि गलत नीतिओ और भार्ष्ठाचारो से  उपजे .लालू प्रसाद भी एसे ही कारणों से मुख्या मंत्री बने थे उस समय विश्व नाथ चंद्रशेखेर और देवीलाल  का खेल था.
नितीश कुमार में चमत्कार या आकर्षण तो नहीं है पर आत्मविश्वास के धनी है अउर  भाग्य के भी.
   
       

      se

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