आजकल अखबार और टी. व्. पर छाया है पाकिस्तान. उनके खिलाडियो ने धांधली की है और देश के सम्मान को बेचा है.वोह बाढ़ आई हुई है और भारत मदद करना चाहती है जो उसे चाहिए तो पर मानाने को तैयार नहीं है लेने को . भारत ने सहायता की राशी भी बढ़ा दी है.
इन दोनों बातो को सांस्कृतिक विचार से सोचिए. आज संस्कृति में पैसा का महत्वपूर्ण हिस्सा हो गया है.क्रिकेट में ही एसा किउ हो रहा है?
संस्कृति पर दरअसल सभ्यता की पकड़ जाएदा है. आज सभ्य बनने के लिए अमीर बनना ज़रूरी है. यह पाकिस्तान ही नहीं पूरा विश्व इस बीमारी की चपेट है. इसके लिए मच्छड़ो की भी ज़रूरत नहीं है यह तो अपने आप देखा देखी बढ़ जाता है.खिलाडी बेईमान नहीं है खेलना जानते है और यह भी जानते है की में हू तभी देश है.क्रिकेट ही किउ हर क्षेत्र में येही हाल है. राज नेता हो या पत्रकार,समाज सेवक हो या व्यापारी .सब जगह येही हाल है दूसरो की चोरी अपराध है और अपनी चालाकी. जो भी कमजोर हुआ वोह मरा. जिसको जहा दाव लगा वोही ले मारा.गरीब भी छोड़ता नहीं है. गरीब भी अमीरों को नहीं छोड़ता और अमीर तो अमीर बना ही इस गुण से .
संस्कृति पर सभ्यता हावी होती है तभी एसा होता है . संस्कृति समाज को बचाने के लिए पुकारती है पर हम बहरे होते जा रहे है .हम दूसरो के दर्द में मज़ा लेनेवाले होते जा रहे है और नेता ,पत्रकार.बुद्धिजीवी और लोकप्रियता प्राप्त लोग इस सब का फायेदा उठा रहे है .किउ हो रहा है यह सब? सोचिए
पाकिस्तान मर रहा है और सारे लोग खड़े है वसीयतनामा लेकर चीन चाहता है मुझे तो अमेरिका मुझे . अमेरिका दोनों तरफ है पाकिस्तान जाए तो भारत हाथ से न जाए .सोचना चीन और भारत को है हमें सोचना है कि२१ वि सदी में विश्व का रूप कैसा चाहते है. यह भी सच है समए पूर्व की तरफ आया है .सूरज उग रहा है.उगते सूरज के समए शांत दिमाग से सोचे नहीं तो पूरी सदी यानि पूरा दिन परेशानी में गुजरेगा.अमेरिका का क्या है. वह अगर नहीं खेलेगा तो कुच्ची में पेसाब करने की सोचेगा और करेगा भी उसने पिछली सदी में अपना रूप साफ़ कर दिया है कि चित भी मेरी और पट भी मेरी और अन्ता मेरे बाप का खैर इस पर बात कभी और
बिहार में चुनाव है और बात इस पर हो रही थी . में लालू जी पर बात करने से पहले एक बात और करना चाहता हू .में हू संस्कृति का विद्यार्थी फिर राजनीती पर किउ कर रहा हू बात और अगर करनी ही थी तो मंच पर नाटको के ज़रिए करता जैसा कि आज तक करता रहा और मन मिया मिट्ठू बना रहता. गंभीर बात है मेरी ज़न्दगी काऔर शायद मेरे दोस्तों को अच्छा नहीं लगे . नाटक जागरण का मंच था और जन नाटय मंच ने इसमें महतवपूर्ण भूमिका निभाई है . समय बदल गया है या मुझे एसा लगता है . नाटक निर्देशकों कि आत्म संतुस्ती और कलाकारी के बायोडाटा का काम कर रहा है . वक़्त है हथोरा का सुनार के सो चोट से गहने बनाए जा सकते है पर उसके लिए सोना चाहिए अब तो लोग लोह्पुरुष है और लोग जागरूक होकर सोने का बहाना बनाते है .खैर में जैसा भी हू वैसा ही हू. किउकी.................................. किउकी हू
लोकतंत्र . एक था लोकतंत्र. वैशाली में . बुद्ध को बहुत पसंद था. उसने भी इसकी चर्चा की है गुणी लोग मुझ से इस बारे में जाएदा जानते है. राजा को जनता चुनती थी
लोकतंत्र. एक है लोकतंत्र. २० वी शताब्दी का.लिंकन को बहुत पसंद था.राष्ट्रपति जनता के लिए जनता के द्वारा
लोकतंत्र. शायद एक होगा लोकतंत्र. कोंग्रेस का लोकतंत्र. अध्यक्ष द्वारा प्रधान मंत्री का चुनाव. भारत में इसकी नीव पड़ी है
बिहार के चुनाव से इसका लेना देना नहीं है.बिहार अभी भी पहले लोकतंत्र को मानती है.वैशाली का लोकतंत्र. तभी जाति का महत्व हो जाता है. गलती से ही सही लालू जी इसी परंपरा के चमत्कारी नेता है.गलतियो को गुणों में बदल देना उन्हें आता है. अगर एक समुदाए अलग होता है तो दूसरे को जोड़ लेते है.देखना है इस बार उनका क्या असर होता है? मारा हुआ हाथी भी लाख का पर लालू जी तो अभी मरे भी नहीं है और बुधि भी सही सलामत है. मुखोटो में उनका मुखोटा हसमुख और मजाकिया है जो सहजता का चोला पहन रखा है
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